घरेलू हिंसा- प्यार में मार की गुंजाइश कहां!

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घरेलू हिंसा- प्यार में मार की गुंजाइश कहां!

जानिए घरेलू हिंसा से जुड़े कारण और उनके निवारण से जुड़ी हर ज़रूरी बात।

घरेलू हिंसा- प्यार में मार की गुंजाइश कहां!

ज़्यादातर लोगों को याद ही होगा कि कुछ अर्सा पहले ही एक फिल्म आई थी, ‘थप्पड़’। तापसी पन्नू की अदाकारी से सजी इस फिल्म को आलोचकों की सराहना तो काफ़ी मिली, लेकिन आम दर्शकों के गले यह फिल्म बहुत ज़्यादा उतर नहीं पाई। वजह थी इस फिल्म की विषय-वस्तु, जिसमें पति द्वारा मारे गए एक थप्पड़ के चलते पत्नी उससे संबंध विच्छेद कर लेती है। जिस भारतीय समाज में पति द्वारा पत्नी पर हाथ उठाना कोई बड़ी बात न मानी जाती हो, उसी समाज में महज एक थप्पड़ घर टूटने की वजह बन सकता है, यह बात ज़्यादातर लोगों के लिए बात का बतंगड़ बना देने जैसी थी। हालांकि फिल्म की नायिका का कहना था कि भले ही एक थप्पड़ था, लेकिन नहीं मार सकता। साथ ही वह यह भी कहती है कि इस बात की क्या गारंटी है कि पहला ही थप्पड़ आख़िरी भी था। आगे ऐसा फिर नहीं हो सकता था। बात में दम तो है, क्योंकि घरेलू हिंसा के मामलों का सच यही तो है कि शुरुआत एक-आध थप्पड़ से होती है, जोकि बढ़ते-बढ़ते इतनी बढ़ जाती है कि फिर ‘हिंसा’के दायरे में आ जाती है।

घरेलू हिंसा एक ऐसी समस्या है, जो कि भारतीय समाज में तो इतनी जानी-पहचानी है कि इसे सदियों से पति-पत्नी के बीच का आपसी मामला कहकर नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है, लेकिन दुनिया के विकासशील और कथित रूप से ज़्यादा ‘सभ्य’ कहे जाने वाले देश भी इस समस्या से अछूते नहीं है। जी हां, पत्नी या प्रेमिका पर हाथ उठाना या उसके साथ हिंसक  व्यवहार करना इतनी ‘मामूली बात’ है, जिसे अव्वल तो कोई ‘समस्या’ माना ही नहीं जाता और अगर मान भी लिया जाए तो इसके समाधान की ज़रूरत महसूस नहीं की जाती, लेकिन अगर एक महिला के दृष्टिकोण से देखा जाए तो घरेलू हिंसा न केवल उसे शारीरिक रूप से पीड़ित करती है, बल्कि एक व्यक्ति के रूप में उसके स्वाभिमान और गरिमा को भी ठेस पहुंचाती है। वैसे तो यह समस्या आज की नहीं है, लेकिन कोरोना काल के चलते हुए लॉकडाउन ने इसे और बढ़ाने का काम किया है। लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा संबंधी शिकायतों में बेहद चिंताजनक रूप से वृद्धि हुई है। इसकी गंभीरता देखते हुए समाधान तलाशना बहुत ज़रूरी है। इस विषय पर आगे बढ़ने से पहले आइए सबसे पहले ये जानते हैं कि घरेलू हिंसा है क्या।

क्या है घरेलू हिंसा

अगर घरेलू हिंसा को समझना हो तो इसे मोटे तौर पर चार भागों में बांटा जा सकता है, जिसके अंतर्गत आते हैं- शारीरिक, भावनात्मक या मौखिक, आर्थिक और यौनिक रूप से की गई हिंसा। इन्हें इस तरह समझिए-

शारीरिक हिंसा- यह ऐसी हिंसा है, जिसमें पीड़ित महिला पर शारीरिक रूप से आघात किया गया हो, यानी उसे हाथ से या किसी वस्तु की सहायता से मारा-पीटा गया हो, उसका गला दबाने का प्रयास किया गया हो। यह ऐसा व्यवहार है, जिससे वह महिला शारीरिक रूप से घायल हो सकती है अथवा उसके जीवन तक को ख़तरा हो सकता है।

भावनात्मक या मौखिक हिंसा- इसके अंतर्गत आता है ऐसा व्यवहार, जो कि किसी महिला के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाता हो, उसकी गरिमा को नष्ट करता हो या उसमें भय उत्पन्न करता हो, जैसेकि- गाली देना, ताने मारना, डराना-धमकाना वग़ैरह।

आर्थिक हिंसा- आर्थिक रूप से किसी महिला को बेबस कर देना या उसके अधिकार की धन-संपदा को उसे न देना या उस पर अनुचित रूप से अपना अधिकार जमा लेना।

यौनिक हिंसा- एक महिला के लिए हिंसा का यह रूप इतना ज़्यादा गहरा है, जो कि अंदर तक पूरी तरह से तोड़ देता है। इसके लिए महिला को शारीरिक रूप से संबंध बनाने के लिए जबरन बाध्य करना या ज़बरन शारीरिक संबंध बना लेना आता है। अप्राकृतिक रूप से बनाए गए शारीरिक संबंध को भी इसी यौनिक हिंसा के अंतर्गत माना जाता है।

कौन आता है घरेलू हिंसा के अंतर्गत

इसके अंतर्गत पत्नी अथवा प्रेमिका के अलावा वे संबंध भी आते हैं, जो रक्तजनित हों, विवाह जनित हों या फिर दत्तक यानी कि गोद लिए गए रिश्ते से संबंधित संबंध हों, जैसेकि बहन, मां, भाभी, बेटी वग़ैरह। ऐसा नहीं है कि घरेलू हिंसा के अंतर्गत केवल महिलाएं ही पीड़ित के रूप में आती हों, बल्कि घरेलू हिंसा से महिला सुरक्षा अधिनियम 2005 के अनुसार महिलाओं के अलावा बच्चों व वृद्धों के साथ की गई हिंसा भी अपराध की श्रेणी में आती है। यदि समाज का एक और चेहरा देखें तो आज पुरुष भी घरेलू हिंसा से बच नहीं पाते हैं, लेकिन इस पक्ष के बावजूद बड़ी संख्या अभी भी महिलाओं की ही है। यदि भारत के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो इसका एक कारण तो यह मानसिकता है कि शादी के बाद पुरुषों को पत्नियों के साथ मनचाहा व्यवहार करने की छूट मिल जाती है। दूसरा यह कि महिलाएं पुरुषों के मुकाबले शारीरिक रूप से कमज़ोर होती हैं। भारत जैसे पुरुष प्रधान समाज में एक और कारण के रूप में यह पक्ष भी देखा जा सकता है कि महिलाओं पर हाथ उठाने को पुरुष अपनी ‘मर्दानगी’ की शोभा समझते हैं।

क्या है बचाव के तरीके

महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए कानून में बाकायदा व्यवस्था की गई है। इसके लिए पीड़ित महिला घरेलू हिंसा निवारण से संबंधित किसी भी अधिकारी, जैसेकि उपनिदेशक, महिला एवं बाल विकास, बाल विकास परियोजना या महिला आयोग से संपर्क कर सकती है। पुलिस के माध्यम से भी संपर्क किया जा सकता है और किसी ग़ैर सरकारी समाजसेवी संगठन की सहायता से भी। इसके लिए प्रार्थना पत्र भी पीड़ित महिला स्वयं या अपने किसी भी सहयोगी की मदद से डाल सकती है। 

यदि हम अपने देश में घरेलू हिंसा में महिलाओं की दशा समझने के लिए वास्तविक वस्तुस्थिति पर नज़र डालें तो एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग पांच करोड़ महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हैं, लेकिन इस मामले में निवारण के लिए कदम एक प्रतिशत से भी कम महिलाएं ही उठाती हैं। इसमें दोष महिलाओं का भी इसलिए नहीं माना जा सकता, क्योंकि हमारे देश में शादी के बाद घर बचाने की ज़िम्मेदारी तो महिलाओं की ही मान ली जाती है। उन पर शारीरिक, मानसिक, मौखिक, आर्थिक या यौनिक शोषण को असल में कोई शोषण माना ही नहीं जाता। फिर समाधान के लिए तो पहल तब की जाए, जब समस्या को समस्या समझा जाए।

घरेलू हिंसा के संबंध में समाज में स्थिति बदले, इसके लिए सिर्फ़ कानूनी व्यवस्था ही काफ़ी नहीं है, समाज का नज़रिया बदलना भी ज़रूरी है।कानून में तो पहले से ही इस बात की व्यवस्था है कि घरेलू हिंसा के मामले साठ दिन के भीतर निपटा लिए जाएं। हां, ये और बात है कि वास्तव में पहली सुनवाई होने में ही महीनों लग जाते हैं। ज़मीनी स्तर पर इसका सटीक समाधान निकले, इसके लिए सबसे पहले तो परिवार में बेटा-बेटी का फ़र्क ख़त्म करने की ज़रूरत है। दोनों को समान परवरिश मिले, यह सुनिश्चित होना चाहिए। संतान के रूप में बेटे की चाह और दहेज प्रथा जैसी समस्याएं घरेलू हिंसा की जड़ें हैं। विवाह जैसी संस्था में भी पति और पत्नी के बीच समानता का व्यवहार और परस्पर आपसी भागीदारी होना भी बहुत ज़रूरी है। यदि महिलाएं शिक्षित, जागरूक और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होंगी तो इस समस्या के समाधान की बड़ी दिशाएं निकल सकती हैं। रिश्तों में प्यार होना किसी भी संबंध के बने रहने की पहली शर्त है। जहां रिश्तों में प्यार होगा, वहां तकरार की संभावना तो हो सकती है, मगर मार की नहीं।