क्या आपको भी आदत है खाना बचाने की

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क्या आपको भी आदत है खाना बचाने की

घर पर नियमित खाना अनुपात में ही बनाएं

क्या आपको भी आदत है खाना बचाने की

‘खाना ज़रूर खाकर जाइएगा।’ अक्सर शादी-ब्याह या किसी पार्टी वग़ैरह के मौके पर हमें ऐसी बातें को सुनने को मिल ही जाती हैं या फिर हम ही दूसरों को यह कहते नज़र आते हैं।सिर्फ़ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अक्सर लोग शादी-ब्याह जैसे अवसर या किसी बड़ी पार्टी के वक़्त अपने वैभव का प्रदर्शन करने से चूकते नहीं हैं। सो खाने-पीने की बेशुमार चीज़ें मेहमानों को परोसी जाती हैं। अब मेहमान भी भला कैसे पीछे रहें। पेट की भले ही एक सीमा हो, लेकिन प्लेट की सीमा तो थोड़ी ज़्यादा हो ही सकती है। लिहाज़ा एक ही प्लेट तरह-तरह के व्यंजनों का संगम बनी नज़र आती है। इसमें भी कोई हर्ज नहीं, अगर लेने वाला इस खाने के साथ इंसाफ़ करे, मगर होता क्या है कि प्लेट में से कुछ खाया और काफ़ी-कुछ बचाया वाली बात नज़र आती है। ज़ाहिर है कि सब कुछ तो स्वादिष्ट नहीं लग सकता या फिर पेट ही भर जाए तो कोई क्या करे। फिर प्लेट में तो बचेगा ही।

इसके अलावा कुछ लोग मौसम बदलने पर, खासतौर पर सर्दियों में भी खाने-पीने की मात्रा बढ़ा देते हैं और बरसात तो है ही चाय-पकौड़े का मौसम। अब इस दौरान खाना न सिर्फ़ खाया ज़्यादा जाता है, बल्कि बचाया भी ख़ूब जाता है।बहुत ज़्यादा तनाव में जहां आपने सुना होगा कि कुछ लोग खाना ही छोड़ कर बैठ जाते हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो और दिनों या अपनी रेग्युलर डाइट के मुकाबले काफ़ी ज़्यादा खाने लगते हैं और बचाने भी।खाने से संबंधित सबसे ज़्यादा ग़लत बातें देखने को मिलती हैं रेस्टोरेंट या होटल वग़ैरह में। तब लोग ऑर्डर तो बहुत-कुछ कर देते हैं, लेकिन टेबल पर क्या और कितना बचा है, इस पर कम ही ध्यान देते हैं।सोने पर सुहागा तो ये कि लोग प्लेट में खाना बचाने को तमीज़, यानी ‘मैनर्स’ से जोड़कर देखते हैं।

अभी हाल ही में आई रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में हर दिन लगभग ग्यारह लोग भूख से मर जाते हैं। जिस देश में भूख से मरने वालों की संख्या का ये हाल हो, वहां प्लेट में खाना बचाने से ज़्यादा ‘बदतमीज़ी’ शायद ही कुछ और हो। अब जहां समस्या होती है तो वहां समाधान भी होता है। कुछ छोटे-छोटे समाधान हम यहां आपको बता रहे हैं।

घर पर नियमित खाना अनुपात में ही बनाएं

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हर घर में खाना बनना एक आम सी बात है और खाने का बचना भी। ऐसे में आप अपनी ज़रूरत का आंकलन ध्यान से कीजिए और कोशिश कीजिए कि खाना उतना ही बनें, जितना कि उसी समय या उसी दिन ख़त्म हो जाए। हालांकि लोग ऐसा करते हैं, लेकिन एक ही डिश को दोहराने में लोगों की कम ही दिलचस्पी होती है, जिसका नतीजा होता है, खाने का बचना। सो सबसे अच्छा है कि खाना अपनी ज़रूरत के अनुपात से ही बनाया जाए। वैसे भी बासी खाना सेहत के हिसाब से भी अच्छा नहीं माना जाता।

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शादी या पार्टी में संयम बरतें

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जैसाकि हमने कहा था कि शादी-ब्याह या पार्टी जैसे मौके को लोग अपने वैभव प्रदर्शन से जोड़कर देखते हैं। ऐसे में अगर आप किसी पार्टी या शादी के अवसर पर शामिल हुए हैं तो कोशिश कीजिए कि अपनी प्लेट में उतना ही खाना लें, जितना कि आप पूरा खा सकें। ये बिल्कुल मत सोचिएगा कि कोई आपकी सफाचट प्लेट को देखकर क्या सोचेगा। आप तो उसके बारे में सोचिए, जो कहीं एक दाने तक के लिए तरस भूखा सोया होगा। अगर पार्टी या कोई ख़ास मौका आपके घर पर है तो भी खाने की बहुत सारी चीज़ें रखने की बजाय कुछ ही चीज़ें रखें। डिशेज़ कम होंगी, मगर ज़ायकेदार होंगी तो किसी का ध्यान इस बात पर नहीं जाएगा। अगर जाता भी है तो भी आपको इस बारे में ज़्यादा सोचने की ज़रूरत नहीं है। आपको शायद मालूम ही होगा कि गुरुद्वारे में की जाने वाली शादियों में खाने की बहुत लिमिटेड डिशेज़ ही सर्व की जा सकती हैं। ये उन लोगों के लिए भी बहुत राहत की बात होती है, जो ज़्यादा ख़र्च करने की सामर्थ्य नहीं रखते। सादगी की अपनी ही बात है।

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होटल या रेस्टोरेंट में खाते हुए

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ऐसे में आप कोशिश कीजिए कि आप वही चीज़ें मंगवाएं, जो आपको बेहद पसंद हैं, ताकि आप उसे पूरा खा सकें। अगर कोई नई डिश ट्राई कर रही हैं और फिर बाद में उसका ज़ायका पसंद नहीं आया तो उसे पैक करवा लीजिए। यही आप बच गए खाने के साथ भी कर सकते हैं और फिर उस पैक खाने को किसी ज़रूरतमंद व्यक्ति को दे सकते हैं।

शायद आपने कभी ग़ौर किया हो या नहीं, मगर हमारे देश में बहुत से लोगों के लिए कूड़ेदान सिर्फ़ कूड़ा उठाने की जगह नहीं है, बल्कि बहुत से लोग वहां तक खाना ढूंढ़ते मिल जाएंगे, क्योंकि सभी को ये ज़रूरी नहीं लगता कि बचा हुआ खाना किसी ज़रूरतमंद को दे दिया जाए। उससे ज़्यादा आसान उसे कूड़े के ढेर पर फेंक देना लगता है।

हमारा मकसद आपकी पार्टी का या डायनिंग टाइम का मज़ा ख़राब करना नहीं है, लेकिन बस इतना याद दिलाना ज़रूर है कि किसी द्रौपदी के अक्षय पात्र में बचे हुए एक दाने से भी कोई कृष्ण तृप्त हो सकता है। बात बस नीयत की है।