बिकाऊ तिरंगे

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बिकाऊ तिरंगे

हमारे समाज की कुछ ऐसी सच्चाइयां हैं, जो 15 अगस्त भी कुछ और ही सच बयान करती हैं।

बिकाऊ तिरंगे

ख़रीद लो
ख़रीद लो कि बिक रहे हैं तिरंगे चौराहों पर
कुछ मासूमों के काले-गंदे-खुरदुरे हाथों में,

शायद उन तिरंगों से तुम्हें
अपनी गाड़ी या दफ़्तर सजाना हो,
शायद बिके तिरंगों की कीमत से उन्हें
उस दिन अपने घर का चूल्हा जलाना हो,

ख़रीद लो तिरंगे
कि तिरंगे बेचने वालों में शायद
कई ऐसे हाथ भी शामिल हों
जो व्यवस्था से लड़कर आगे तो आए
मगर इस व्यवस्था की व्यवस्था से
खुद को बचा नहीं पाए
इनकी कामयाबी पर तो
सीना ठोककर हिंद भी नाज़ करता है
मगर सड़क किनारे जनमते और मरते इन बदनसीबों को
अक्सर कफ़न तक नहीं मिलता है, इसलिए

ख़रीद लो तिरंगे इनसे
कि तुम इन्हें तो क्या बचा पाओगे
इनका मुकद्दर तो क्या बदल पाओगे,
बस इनकी एक सर्द शाम को भूखा रहने से बचा लो
कीमत चुका दो आज इन तिरंगों की और
खुरदुरे हाथों से ख़रीदे इन रेशमी तिरंगों को
शान से आसमान में फहरा लो

ख़रीद लो
ख़रीद लो कि बिक रहे हैं तिरंगे चौराहों पर
कुछ मासूमों के काले-गंदे-खुरदुरे हाथों में...