मर्द को भी दर्द होता है!

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मर्द को भी दर्द होता है!

19 नवंबर को अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

मर्द को भी दर्द होता है!

अक्सर हम सिक्के का एक पहलू देखते हुए दूसरे पहलू की अनदेखी कर देते हैं। अब इंटरनेशनल मेंस डे, यानी अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस को ही ले लीजिए। जहां एक तरफ़ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर पूरी दुनिया में एक तरह का ख़ास उत्साह और तैयारी देखने को मिलती है, बाज़ार तक इस दिन के लिए नए ऑफर्स के साथ सज जाते हैं, वहीं इंटरनेशनल मेंस डे को भारत में कोई बहुत ज़्यादा गंभीरता से लेता हुआ नज़र नहीं आता। पुरुषों में भी इस दिन से जुड़ने में कोई ज़्यादा उत्साह नहीं दिखता। यहां तक कि कइयों के लिए तो यह थोड़ा हास्यास्पद भी लगता है। 
अब अगर हम इसी सिक्के के दूसरे पहलुओं को भी देखें तो अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाने की ज़रूरत भी उतनी ही है, जितनी कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की। वजह ये है कि किसी भी दिन को ख़ासतौर पर मनाने की ज़रूरत ही तब पेश आती है, जब उस दिन से जुड़े कुछ पहलुओं की तरफ़ ध्यान देना ज़रूरी हो जाता है। उस वर्ग से जुड़े कुछ मसले ऐसे होते हैं, जिन्हें हल किया जाना बाकी होता है और उसमें सभी की साझेदारी की अपेक्षा होती है। अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस भी इसी सिलसिले की एक कड़ी है। 

कब से शुरू हुआ ये सिलसिला


इससे पहले कि हम अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस से जुड़ी कुछ अन्य बातों को जान लें, सबसे पहले हमें ये जानना चाहिए कि इस सिलसिले की शुरुआत कब और कैसे हुई थी। यह साल 1928 का समय था, जब कुछ लोगों ने इसकी मांग शुरू की थी। फिर वर्ष 1968 में एक अमेरिकी पत्रकार जॉन पी. हैरिस ने अपने एक लेख में इस बात का ज़िक्र किया कि सोवियत सिस्टम में संतुलन की काफ़ी कमी है, क्योंकि यह अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को तो महत्त्व देता है, लेकिन पुरुषों के लिए वे ऐसी कोई आवश्यकता महसूस नहीं करता। इसके बाद त्रिनिनाद और टोबैगो द्वारा पहली बार साल 1999 में अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाने की शुरुआत हुई। वैसे अगर इस बारे में जागरूकता पैदा करने की बात हो तो हम एडवोकेट उमा चल्ला के नाम को भुला नहीं सकते, क्योंकि वे इस बात को बहुत प्रमुखता से प्रकाश में लाई थीं कि ऐसे बहुत सारे पुरुष हैं, जो पुरुष विरोधी कानूनों के चलते बहुत तकलीफ़देह स्थिति में हैं। यहां तक कि इस बात पर भी ग़ौर करने की ज़रूरत है कि बहुत से कानूनों को लचीला बनाया तो महिलाओं को संरक्षण देने के लिए गया था, लेकिन आगे चलकर यही लचीलापन कुछ कानूनों के दुरुपयोग की वजह भी बन गया था। सो इस तरह से शुरू हुआ अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाने का सिलसिला, जो कि आज लगभग 60 से अधिक देशों में बाकायदा मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य था एक ऐसी दुनिया के निर्माण, जहां पुरुषों के साथ भी भेदभाव, उत्पीड़न और असमानता का माहौल न हो। साथ ही उनकी सुरक्षा को भी ज़रूरी माना जा सके। 

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क्यों मनाना चाहिए अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस

ये एक बड़ा सवाल है कि क्यों और कैसे मनाया जाना चाहिए इंटरनेशनल मेंस डे को। सबसे पहले ज़रा अपने आस-पास नज़र दौड़ाइए तो पुरुषों में भी कई ऐसे नाम, रिश्ते और चेहरे आपके सामने आ जाएंगे, जो किसी न किसी रूप में आपके लिए एक सुखद याद का कारण बने होंगे। साथ ही आप किसी न किसी ऐसे पुरुष को भी जानती होंगी, जो अपने परिवार की या अपने से जुड़े लोगों की देखभाल तो बहुत अच्छे से कर लेते हैं, लेकिन अपनी बात आने पर वे बड़े लापरवाह नज़र आते हैं। न सिर्फ़ अपनी सेहत के प्रति वे लापरवाह होते हैं, बल्कि खान-पान तक में उनकी उदासीनता झलकती है। ख़ास से ख़ास मौके पर भी उनकी तैयारी या कपड़ों पर एक सादगी ही हावी रहती है। आपका कोई परिचित ऐसा भी होगा, जो खुद तो ज़िम्मेदारियों के बोझ से इतना दबा हुआ है कि पूछो मत, लेकिन उस तकलीफ़ को वह किसी से नहीं कहता। उस पर ये तो सामाजिक रूप से चर्चित है कि मर्द रोते हुए अच्छे नहीं लगते। दिल तो पुरुषों के पास भी होता है तो दर्द का एहसास तो उन्हें भी होता होगा न। इन वजहों के चलते पुरुष भी डिप्रेशन और हार्ट संबंधी तकलीफ़ों से बड़े पैमाने पर घिरे नज़र आते हैं। तब हम कैसे इस बात से इंकार कर सकते हैं कि प्यार, देखभाल, सहानुभूति, सम्मान और आत्मीयता के वे भी उतने ही हकदार हैं, जितना कि कोई और हो सकता है।
यह दुनिया आपसी समझ, विश्वास और सम्मान से ही चलती है, जो कि स्त्री और पुरुष दोनों के ही बीच होना चाहिए। आख़िर आधी-आधी दुनिया की साझेदारी इन दोनों ही की तो है। हैप्पी इंटरनेशनल मेंस डे!