Tanha- Ek Ghazal
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Tanha- Ek Ghazal

है घड़ी पर वक़्त नहीं है मेरे पास, न शब मेरी और न मेरी सहर है।

Tanha- Ek Ghazal

The following ghazal has been written by Dr Mohsin Khan. Dr Khan is HOD Hindi and Research Director at JSM college, Alibaugh, Maharashtra.  He is also a member of Board of Studies, Hindi, Mumbai University, Mumbai.

1

मैं चल तो रहा हूँ, पर अब लड़खड़ा रहा हूँ।
गिर न  जाऊँ तू थाम ले,  हाथ बढ़ा रहा हूँ।

तू छूले आसमाँ, ये वक़्त है बुलंदी पाने का,
ले मैं  अपने कांधों पे  तुझको  चढ़ा रहा हूँ।

यहीं की चीज़ यहीं ख़त्म हो तो अच्छा है,
इन  दिनों बचे हुए  सब  पैसे उड़ा रहा हूँ।

तेरे शह्र की सूरत कितनी जल्द बदल गयी,
मैं हरेक  गली के  मोड़ पे  गड़बड़ा  रहा हूँ।

कल दुनिया बदलेगा इनमें से कोई होनहार,
मक्तबे में बच्चों को  ये सोच के पढ़ा रहा हूँ।

2

यारों ज़िन्दगी का कैसा सफ़र है।
इस तरफ़ घर है, उधर दफ़्तर है।

कितना उलझ गया हूँ काग़ज़ों में,
बस एक स्याह-सफ़ेद समंदर है।

है घड़ी पर वक़्त नहीं है मेरे पास,
न शब मेरी और न मेरी सहर है।

जाने कहाँ गुम हो गया हूँ भीड़ में,
एक शख़्स ख़ामोश मेरे अंदर है।

हूँ थोड़ा परीशाँ और मायूस भी,
तबादलों के मौसम का असर है।

'तनहा' मैं जिया किसके ख़ातिर,
न दोस्त है, न साथ हमसफ़र है।


3
मैं न रहा कोई दूसरा हो गया।
न जाने ये  क्या माजरा हो गया।

रहता है दिल डूबा-डूबा अक्सर,
मैं टूटके बिखरा-बिखरा हो गया।

कब क्या करजाऊँ लाएतबर हूँ मैं,
अपनेआप से मुझे ख़तरा हो गया।

मेरी ख़ामोशी का सबब न पूछ तू,
कोई ज़ख़्म बहोत गहरा हो गया।

मैं दरिया था कभी अब ये हाल है,
सिमटते-सिमटते क़तरा हो गया।

पत्थर  हो गए लोग यहाँ के सारे,
दश्त क्यों सारा ये सहरा हो गया।

'तनहा' टूटके आइना बिखर गया,
और टुकड़े-टुकड़े चेहरा हो गया।

4

हवाओं के भी कहाँ घर होते हैं।
बस  सफ़र पर सफ़र  होते हैं।

रहती हैं  ख़ौफ़ज़दा  कश्तियाँ,
जब  तूफ़ानी समन्दर  होते हैं।

छिल गया सारा बदन नदी का,
राहों में कितने पत्थर होते हैं।

और भी ठंडी हो जाती है छाँव,
जब ज़्यादा बूढ़े शजर होते हैं।

एक शै की गिरफ़्त है रात-दिन,
जाने कैसे-कैसे असर होते हैं।

मिट्टी मिल जाएगी मिट्टी में,
'तनहा' बेचैन सोचकर होते हैं।


5

डरे-डरे से, सहमे-सहमे से रहते हैं।
आजकल हम थमे-थमे से रहते हैं।

सर्द फ़ज़ाओं ने कैसा क़हर बरपा है,
अकड़े-अकड़े, जमे-जमे से रहते हैं।

ये आँधियाँ तोड़ न डालें ये सोच के,
इनदिनों बहोत नमे-नमे से रहते हैं।

अब नहीं होती है हमसे आवारागर्दी,
चहारदीवारी में रमे-रमे से रहते हैं।

'तनहा' कैसा दौर आया है मुल्क में,
हरेक जगह अब मजमे से रहते हैं।

डॉ. मोहसिन  ख़ान
डॉ. मोहसिन ख़ान
119 Days Ago
आपके पोर्टल के लिए अनेक शुभकामनाएं?