बुरा नहीं होता कभी-कभी ग़ुस्सा करना भी

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बुरा नहीं होता कभी-कभी ग़ुस्सा करना भी

हम आपको बताने जा रहे हैं, ग़ुस्सा करने के कुछ फ़ायदों के बारे में।

बुरा नहीं होता कभी-कभी ग़ुस्सा करना भी

ग़ुस्सा करने के नुकसान तो इतने सारे हैं कि उनके बारे में हम ख़ुद भी काफ़ी-कुछ जानते हैं और अक्सर उसके बारे में जानते-सुनते भी रहते हैं, लेकिन कुछ मनोविज्ञानियों का मानना है कि हमेशा अपने ग़ुस्से को दबाए रखना भी सही नहीं है। यहां तक कि हमेशा ऐसा करना कई समस्याओं की वजह भी बन सकता है। सो आज हम यहां आपको बता रहे हैं इसी विषय में कुछ बातें।
ग़ुस्सा कभी-कभी ही ठीक 
सबसे पहली और सबसे ज़रूरी बात तो यही है कि हमेशा ग़ुस्सा करते रहना ठीक नहीं है, क्योंकि इससे आपकी छवि ही एक ग़ुस्सैल व्यक्ति की बन जाएगी। साथ ही यह आपकी सेहत पर भी बुरा असर डालता है, इसलिए जहां तक हो सके, ग़ुस्सा करने से बचें। अब हम समझते हैं इस बात का दूसरा पहलू। अपने ग़ुस्से को हमेशा दबाना भी ठीक नहीं है, बल्कि अगर आपको कभी इस बात की ज़रूरत महसूस हो या पानी सिर से ऊपर जा रहा हो तो अपने ग़ुस्से को दबाने की बजाय उसे ज़ाहिर करें।

नाराज़गी से गंभीरता भी पैदा होती है

कभी-कभी आप अगर किसी बात से नाराज़ होकर अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर करते हैं तो इसका एक लाभ यह भी होता है कि लोग आपकी बात को काफ़ी हद तक गंभीरता से लेना शुरू कर देते हैं। इसके उलट अगर आप सामने वाले की हर ग़लती को हंसकर टाल देते हैं या नज़रअंदाज़ कर देते हैं तो दूसरे यह मान बैठते हैं कि आपको तो कुछ भी कहा जा सकता है, आप कुछ कहेंगे तो हैं नहीं। यह सोच भी ग़लत और नुकसानदायक है, इसलिए अगर आपको लगता है कि आपकी बात को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है या फिर काम में ग़लती करने को सामने वाले ने आदत ही बना लिया है तो आपने ग़ुस्से को दबाएं नहीं, बल्कि ज़ाहिर कीजिए।

काम पर सकारात्मक असर पड़ता है

आपका ग़ुस्सा अगर सही कारणों से है तो इसका असर काम पर भी सकारात्मक रूप से पड़ता है। काम वक़्त पर और बेहतर ढंग से पूरा होता है। अनुशासन बना रहता है। जब लोग इस बात को समझने लगते हैं कि ग़लत काम पर आप नाराज़ भी हो सकते हैं तो वे उस ज़िम्मेदारी को निभाने में लापरवाही न बरतकर सावधानी से काम लेते हैं और कोशिश करते हैं कि काम को पूरी तरह से ध्यान देकर पूरा करें। 

कई रोगों से होती है रोकथाम

ग़ुस्सा करने के लाभों में से एक लाभ यह भी है कि आप कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं से भी बच जाते हैं, क्योंकि हमेशा ग़ुस्सा दबाने से शायद आप लोगों को ख़ुश भले ही रख पाते हों, लेकिन आपकी सेहत आपसे नाराज़ रहने लगती है। अंदर ही अंदर ग़ुस्सा दबाए रखने से आप कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं की चपेट में आ जाते हैं, जैसेकि- हार्ट अटैक का ख़तरा बढ़ जाता है, रक्तचाप प्रभावित होता है, हमेशा तनावग्रस्त रहते हैं। यहां तक कि अंदर ही अंदर ग़ुस्से को दबाए रखने के चलते कई बार कुछ तरह की कैंसर की चपेट में भी आ सकते हैं। 

डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं

यह तो जानी-समझी बात है कि अगर आप हमेशा अपने ग़ुस्से का दबाए रखेंगे और उसे कभी भी ज़ाहिर नहीं करेंगे तो तय है कि आप एक दिन डिप्रेशन की चपेट में आ ही जाएंगे, क्योंकि लगातार अंदर ही अंदर ग़ुस्से को पालते रहना आपमें फ्रस्ट्रेशन या घुटन पैदा करता है, जिसका अंजाम होता है डिप्रेशन की चपेट में आना। यह समस्याएं उन लोगों में भी अक्सर देखने को मिलती है, जो न केवल अपने गुस्से को दबाए रहते हैं, बल्कि उसे किसी से शेयर तक नहीं करते। सभी को ख़ुश रखने का उनका प्रयास उन्हें अपने ग़ुस्से को ज़ाहिर करने से रोकता है।

ग़ुस्से से कई काम बनते भी हैं

ग़ुस्से से काम बिगड़ते हैं, ये बात तो हम हमेशा से सुनते आए हैं, लेकिन ग़ुस्से से कई काम बनते भी हैं। ग़ुस्से में कई बार कुछ लोग अपनी क्षमता से बढ़कर प्रदर्शन कर दिखाते हैं। ग़ुस्से में लोग अक्सर अपने काम को ज़्यादा गंभीरता से लेने लग जाते हैं। ग़ुस्से में कई बार लोग उन चीज़ों को भी कर डालते हैं, जिनके बारे में अक्सर वे सोचना तक नहीं चाहते हैं। अगर वे इन सभी बातों को एक चुनौती की तरह लेकर ग़ुस्सा करते हैं तो बदले में उन्हें सकारात्मक परिणाम भी मिलते हैं। याद सिर्फ़ इतना रखना है कि हर बात की एक हद होती है, ग़ुस्से की भी और सहनशक्ति की भी। 

ग़ुस्से को ज़ाहिर करें सही तरीके से

कई कारणों के चलते अगर ग़ुस्से को ज़ाहिर करना ज़रूरी है तो उसे सही तरीके से ज़ाहिर करना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है। कभी भी एक व्यक्ति का ग़ुस्सा दूसरे पर न निकालें। जिस व्यक्ति से आपको शिकायत या नाराज़गी है, उसी से बात करें। साथ ही बात करते हुए कोशिश करें कि बात अगर ठंडे तरीके से हो सकती है तो ठीक है, लेकिन अगर सामने वाला लापरवाही पर उतारू है तो अपने ग़ुस्से की एक झलक उसे ज़रूर दिखा दें। याद रखिए कि ग़ुस्सा करने के लिए चीखना-चिल्लाना ज़रूरी नहीं होता, बल्कि आप सख़्त और मज़बूत शब्दों में भी अपनी बात कह सकते हैं। 

वैकल्पिक तरीकों पर करें विचार

कई बार स्थिति ऐसी बन जाती है कि ग़ुस्से को न तो दबाना ठीक होता है और न ही ज़ाहिर करना। अगर ग़ुस्से को ज़ाहिर करते हैं तो नुकसान उठाना पड़ सकता है और लगातार छिपाते हैं तो स्वास्थ्य समस्याओं की चपेट में आ सकते हैं। ऐसे में सबसे अच्छा विकल्प वैकल्पिक तरीकों पर विचार करना हो सकता है। कई मनोविज्ञानी तो इसके लिए बड़े मज़ेदार तरीके बताते हैं, जैसेकि- ठंडा पानी पीना, घर के कामों में जुट जाना, कपड़े या बर्तन धोना, पिलो फाइट या पानी की धार से लड़ना, टॉय फाइट, स्विमिंग करना या शॉवर के नीचे खड़े रहना, जी भर के रो लेना, किसी क़रीबी और विश्वासी व्यक्ति से अपने दिल की बातें साझी कर लेना, किसी काग़ज़ पर सभी बातें लिखकर अपनी भड़ास निकाल लेना और उसके बाद उसे जलाकर नष्ट कर देना, किसी एंकात वाली जगह पर ज़ोर से चिल्लाना वग़ैरह। 
ये सारे तरीके ऐसे हैं, जो आपको ग़ुस्से की चपेट में आने से तो बचाते ही हैं, साथ ही आपके ग़ुस्से को एक सकारात्मक रूप भी देते हैं। तो अगली बार अपने ग़ुस्से को दबाकर सारा बोझ अपने दिल पर ही लेने की बजाय उसे ज़ाहिर भी ज़रूर करें और ज़ाहिर करते हुए हमारी बातें ज़ेहन में रखें।
(प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉक्टर समीर पारिख से बातचीत पर आधारित)