प्यार में मार की गुंजाइश कहां!

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प्यार में मार की गुंजाइश कहां!

25 नवंबर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जुड़ा हुआ है, महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों के उन्मूलन से।

प्यार में मार की गुंजाइश कहां!

अगर महिलाओं के विरुद्ध हिंसा अथवा अपराध की बात आती है तो यह एक ऐसा विषय लगता है, जिस पर हमेशा कुछ न कुछ कहा या किया जाता ही रहता है। यह और बात है कि इन सबके बावजूद इन प्रयासों के परिणाम इतने सुखद नहीं होते कि बहुत आशान्वित हुआ जा सके। कुछ अर्सा पहले ही एक फिल्म आई थी, थप्पड़। इस फिल्म में दिखाया गया था कि पति द्वारा एक थप्पड़ मार देने के बाद स्थिति बिगड़ते-बिगड़ते तलाक तक पहुंच जाती है। उसमें नायिका एक जगह कहती है कि एक ही थप्पड़ था, मगर नहीं मार सकता और इसकी क्या गारंटी है कि दूसरा नहीं हो सकता।


बात तो सही है कि वाकई शुरुआत तो एक थप्पड़ से ही हो जाती है, लेकिन इस बात की तो कोई गारंटी होती ही नहीं कि यह पहला थप्पड़ थप्पड़ों के सिलसिले की शुरुआत नहीं है। ऐसे में जब 25 नवंबर का ज़िक्र आता है, जो कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा के उन्मूलन से जुड़ा है, यानी कि इंटरनेशनल डे फॉर द एलिमिनेशन ऑफ वॉयलेंस अगेंस्ट वुमेन के रूप में मनाया जाता है तो यह एहसास सिर्फ़ एक राहत भरी उम्मीद से तो जुड़ता है, लेकिन सकारात्मक रूप से यथार्थ से परे लगता है। 


पूरी दुनिया में होती हैं महिलाएं हिंसा की शिकार


अब इस बात को बहुत ज़्यादा समय नहीं बीता है, जब डब्ल्यूएचओ और यूएन महिला संयुक्त कार्यक्रम द्वारा जारी रिपोर्ट के ज़रिये ये बात सामने आई कि औसतन हर तीन में से एक महिला को अपने जीवनकाल में अपने ही किसी परिचित अथवा साथी द्वारा शारीरिक अथवा यौन हिंसा का शिकार होना पड़ता है और लगभग हर तीसरी महिला किसी अपरिचित द्वारा किए गए यौन अपराध को सहन करने को मजबूर होती है। यदि हम भारत के संदर्भ में बात करें तो यह आंकड़े कहां तक जा सकते हैं, ये सोचना भी एक डरावना अनुभव साबित हो जाता है, क्योंकि यहां पर अभी भी महिलाओं के प्रति होने वाली शारीरिक, मानसिक व यौनिक हिंसा के मामले में ज़रूरी गंभीरता की कमी के साथ-साथ इन मामलों के समाधान के तौर पर उठाए जाने वाले कदमों की भी काफ़ी कमी है। कानून अपना काम तो करता है, लेकिन अक्सर कानून के लंबे हाथ घरों के भीतर हो रही हिंसा को रोकने में कामयाब नहीं हो पाते हैं। यहां तक कि प्यार में तकरार और मार को तो कई बार प्यार का ही एक रूप समझ लिया जाता है। अब ऐसे में और क्या कहें।


समय के साथ बढ़ते जा रहे हैं अपराध


इस विषय में राष्ट्रीय महिला आयोग की बात गौर करने लायक है कि वर्ष 2021 के बीते महीनों में ही महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों में 46 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिनमें सबसे अधिक शिकायतों के साथ उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर है। उसके बाद क्रमश: दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र आते हैं। शायद इसमें बहुत हद तक कोरोना काल के बाद उपजी परिस्थितियां भी ज़िम्मेदार हैं, लेकिन कोरोना पीड़ितों में तो महिलाओं की संख्या पुरुषों से भी ज़्यादा रही है। दरअसल हमारा समाज शुरू से ही पुरुष सत्ता प्रधान रहा है, जिसमें महिलाओं को हमेशा से दोयम दर्जे का ही समझा गया है। 


परिवार में भी कहां मिलती है समानता


महिलाओं के प्रति भेदभाव की शुरुआत तो उसके जन्म से भी पहले कोख से ही शुरू हो जाती है, जब कन्या भ्रूण हत्या के नाम पर उसका अस्तित्व ही मिटा दिया जाता है। अगर वह जन्म ले भी लेती है तो कदम कदम पर जाने-अनजाने होने वाले अनेक प्रकार के भेदभाव उसके हिस्से में आते रहते हैं। जब परिवार में बिटिया को ‘बेटा’ कहकर लाड़ से बुलाया जाता है, जब बेटे को कार और गन तथा बेटी को किचेन सेट और गुड़िया खिलौने के तौर पर लाकर थमा दी जाती है, जब बेटी की शादी करने को सबसे बड़ा और ज़रूरी काम मान लिया जाता है और बेटे के करियर को, जब शादी के बाद बेटी को पराया मान लिया जाता है और बेटे को घर-संपत्ति का दावेदार, जब बेटी को संपत्ति में हिस्सा देने के नाम पर रिश्तों को भुनाया जाता है और माथे पर बल पड़ जाते हैं, तब हम कैसे कह सकते हैं कि हम अपने परिवार में लड़की और लड़के में कोई भेद नहीं करते। 


सुधार की शुरुआत भी करनी होगी अपने से


जब महिलाओं के प्रति भेदभाव से लेकर हिंसा तक की शुरुआत अपने ही घर से होनी शुरू हो जाती है तो उनके प्रति होने वालों अपराधों के समाधान की शुरुआत भी अपने ही घर से करनी होगी। सबसे पहले तो आपकी बेटियां सुरक्षित रहें, इसके लिए अपने बेटों को संस्कारित करना ज़रूरी है। अपने परिवार के पुरुष सदस्यों को सबसे पहले अपने ही परिवार की महिलाओं का सम्मान करना, उन्हें अहमियत देना सिखाएं। यदि परिवार में कोई पुरुष सदस्य महिलाओं का आदर करना नहीं जानता, उनके कार्यों का महत्व नहीं समझता या बात-बात पर अपशब्द कहना, हाथ उठाना उनका शगल बन जाए तो ज़रूरी है कि उन्हें समय रहते ही उनकी ग़लती का भी एहसास कराएं। 

एक-एक घर जुड़कर ही समाज बनता है। सो यदि हमारे घरों के भीतर महिलाएं अपने को सुरक्षित और सम्मानित समझेंगी और हिंसा से मुक्त रहेंगी तो उनके लिए समाज अपने-आप ही सकारात्मक हो जाएगा। तभी किसी दिन को विशेष रूप से मनाने का औचित्य समझ में आता है, वर्ना हर दिन की तरह वह ख़ास दिन भी औपचारिक बनकर रह जाएगा।